दोनों काम करते हैं — तो घर का काम कौन करेगा?
रात के साढ़े नौ बजे थे। प्रिया अभी-अभी ऑफिस से लौटी थी, लैपटॉप बैग अभी कंधे पर ही था, और सामने डाइनिंग टेबल पर सुबह के बर्तन वैसे ही पड़े थे। रोहन सोफे पर बैठा फोन पर एक क्लाइंट कॉल खत्म कर रहा था। दोनों उस दिन नौ-नौ घंटे काम करके आए थे। दोनों थके हुए थे। और दोनों के मन में एक ही सवाल घूम रहा था, बस कोई बोल नहीं रहा था — आज खाना कौन बनाएगा, बर्तन कौन धोएगा?
अगर आप एक वर्किंग कपल हैं, तो यह सीन आपके घर का भी हो सकता है। यह सिर्फ प्रिया-रोहन की कहानी नहीं है — यह लाखों भारतीय घरों की सच्चाई है, जहाँ पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, लेकिन घर के काम का बंटवारा अब भी बराबर नहीं होता। सवाल सिर्फ “कौन क्या करेगा” का नहीं है — यह सवाल रेस्पेक्ट, बराबरी और रिश्ते की सेहत का भी है।
असली कहानी: प्रिया और रोहन की सुबह की जंग
यह कहानी हमारे एक पाठक ने भेजी है (नाम बदल दिए गए हैं, बाकी सब सच)। प्रिया और रोहन दोनों बेंगलुरु में IT प्रोफेशनल हैं, शादी को चार साल हुए हैं। दोनों की सैलरी लगभग बराबर है, दोनों के काम के घंटे भी लगभग बराबर। लेकिन प्रिया बताती है कि शादी के शुरुआती दो साल उसके लिए किसी जंग से कम नहीं थे।
“सुबह छह बजे उठकर मैं टिफिन बनाती, रोहन की शर्ट प्रेस करती, फिर खुद तैयार होकर ऑफिस भागती। शाम को लौटते ही फिर किचन में। रोहन बुरा इंसान नहीं था — बस उसे लगता था कि यह सब ‘अपने आप’ हो जाना चाहिए, क्योंकि उसकी माँ भी यही करती थीं,” प्रिया कहती है।
धीरे-धीरे प्रिया के अंदर गुस्सा और थकान दोनों बढ़ने लगे। वह चिड़चिड़ी हो गई, रोहन से बात करना कम कर दिया, और एक रात जब उसने रोई तो रोहन को पहली बार एहसास हुआ कि यह सिर्फ बर्तन धोने की बात नहीं थी — यह इस बात की बात थी कि उसकी थकान, उसका समय, उसकी मेहनत को कोई नोटिस भी नहीं कर रहा था।
आज, दो साल बाद, प्रिया और रोहन के घर में एक साधारण-सा सिस्टम है: हफ्ते में तीन दिन खाना रोहन बनाता है, बाकी दिन प्रिया या दोनों साथ में। बर्तन धोने की डिशवॉशर मशीन है, लेकिन उसे लोड-अनलोड करने की बारी बदलती रहती है। सफाई वाली दीदी हफ्ते में तीन बार आती हैं। और सबसे बड़ी बात — हर रविवार सुबह दोनों दस मिनट बैठकर अगले हफ्ते का प्लान बनाते हैं।

समस्या सिर्फ काम की नहीं, सोच की है
भारत में ज्यादातर घरों में यह मान लिया जाता है कि घर का काम “महिला का काम” है, चाहे वह जॉब करती हो या न करे। एक नेशनल सर्वे के मुताबिक भारत में सिर्फ 26% पुरुष ही किसी न किसी रूप में घर के काम में हाथ बँटाते हैं, जबकि महिलाएं अपने दिन का बड़ा हिस्सा अनपेड घरेलू काम में लगाती हैं, वहीं पुरुषों का ज्यादातर समय पेड काम में जाता है। यह आँकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं है — यह बताता है कि क्यों इतनी वर्किंग वुमन शाम होते-होते पूरी तरह थक जाती हैं, दो नौकरियाँ करते हुए भी।
अशोका यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिक्स प्रोफेसर आशिवनी देशपांडे इस पैटर्न की एक बहुत ज़रूरी वजह बताती हैं — उनका कहना है कि किसी इलाके में जितनी मजबूत पैट्रिआर्कल सोच होती है, पुरुषों के पास समय होने के बावजूद भी वे घर के काम में उतना ही कम हाथ बँटाते हैं (The Swaddle)। यानी यह मसला “समय की कमी” का नहीं, बल्कि “सोच की आदत” का है — और आदतें बदली जा सकती हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि जब कपल्स मिलकर घर के काम बाँटते हैं, तो इसका फायदा सिर्फ रिश्ते तक सीमित नहीं रहता। कानपुर में हुए एक रिसर्च में पाया गया कि जब पुरुषों ने काउंसलिंग और कपल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लिया, तो उन्होंने घर के काम में रोज़ाना करीब 36 मिनट ज़्यादा समय देना शुरू किया, और इसके साथ-साथ घर की कुल इनकम और महिलाओं की नौकरी में भागीदारी भी बढ़ी (UT Arlington)। यानी घर के काम का बंटवारा सिर्फ “मदद” नहीं है — यह पूरे परिवार की फाइनेंशियल और इमोशनल हेल्थ से जुड़ा हुआ है।
जब घर का काम एक तरफ झुक जाता है, तो रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?
जब यह ज़िम्मेदारी सिर्फ एक पार्टनर पर आ जाती है — चाहे वह पत्नी हो या पति — तो इसके नतीजे सिर्फ थकान तक सीमित नहीं रहते।
- रिसेंटमेंट बनता है — शुरू में छोटी-छोटी बातें नज़रअंदाज़ होती हैं, लेकिन समय के साथ यह मन में गुस्से और नाराज़गी की तरह जमा होने लगता है।
- इंटिमेसी कम होती है — जब एक पार्टनर लगातार थका हुआ, चिड़चिड़ा या ओवरव्हेल्म्ड महसूस करता है, तो इमोशनल और फिज़िकल क्लोजनेस दोनों पर असर पड़ता है।
- कम्युनिकेशन टूटने लगता है — बहस “बर्तन किसने नहीं धोए” जैसी छोटी बातों पर होने लगती है, जबकि असली मुद्दा होता है “मुझे रेस्पेक्ट नहीं मिल रही।”
- करियर पर असर — जिस पार्टनर पर घर का ज़्यादा बोझ होता है, उसके पास करियर ग्रोथ, नई स्किल्स सीखने या रेस्ट करने के लिए कम समय बचता है।
यह समझना ज़रूरी है कि “घर का काम कौन करेगा” जैसा सवाल छोटा नहीं है — यह बताता है कि रिश्ते में बराबरी और एक-दूसरे की मेहनत की कद्र कितनी है।
तो समाधान क्या है? वर्किंग कपल्स के लिए प्रैक्टिकल टिप्स
अच्छी खबर यह है कि इस समस्या का हल निकाला जा सकता है — बिना किसी बड़ी बहस के, बस थोड़ी सी सोच और ईमानदार बातचीत से।

1. एक ओपन कन्वर्सेशन से शुरुआत करें
बिना इल्ज़ाम लगाए, शांति से बैठकर बात करें — “मुझे लगता है कि मैं ज़्यादा थक जाती/जाता हूँ, क्या हम मिलकर कुछ प्लान बना सकते हैं?” यह लाइन किसी भी बहस से बेहतर काम करती है।
2. काम की लिस्ट बनाएं, फिर बाँटें
अक्सर होता यह है कि एक पार्टनर को अंदाज़ा ही नहीं होता कि दूसरा कितना काम कर रहा है। पूरे हफ्ते के सारे छोटे-बड़े काम कागज़ पर लिखें — तभी सही तस्वीर सामने आती है।
3. “बराबर” का मतलब “आधा-आधा” नहीं है
अगर किसी दिन एक पार्टनर की ऑफिस में डेडलाइन है, तो दूसरा उस दिन ज़्यादा संभाल सकता है। बराबरी का मतलब है फेयरनेस, हर दिन का 50-50 बँटवारा ज़रूरी नहीं।
4. स्ट्रेंथ के हिसाब से काम बाँटें
जिसे कुकिंग पसंद है, वह खाना बनाए; जिसे ऑर्गनाइज़ करना अच्छा लगता है, वह सामान की प्लानिंग संभाले। जबरदस्ती से बेहतर है पसंद के हिसाब से काम बाँटना।
5. हेल्प लेने में झिझकें नहीं
अगर बजट इजाज़त देता है, तो पार्ट-टाइम हेल्प, डिशवॉशर या वॉशिंग मशीन जैसी चीज़ें लेना कोई शर्म की बात नहीं — यह आपके समय और रिश्ते दोनों में इन्वेस्टमेंट है।
6. हफ्ते में एक “चेक-इन” रखें
हर संडे 10 मिनट निकालकर देखें कि पिछला हफ्ता कैसा गया, कहाँ इंबैलेंस हुआ, और अगला हफ्ता कैसे प्लान करना है।
7. थैंक्यू कहना न भूलें
“आज खाना बहुत अच्छा बना” या “थैंक्स कि तुमने आज बर्तन कर दिए” — ये छोटे शब्द रिश्ते में बड़ा फर्क डालते हैं।
प्रिया और रोहन आज कहाँ हैं?
प्रिया हँसते हुए बताती है, “अब हम लड़ते नहीं, प्लान करते हैं। कभी-कभी सिस्टम बिगड़ भी जाता है, लेकिन अब हम दोनों उसे ठीक करने की कोशिश करते हैं — अकेले नहीं, साथ में।” उनकी कहानी यह साबित करती है कि जब दोनों पार्टनर घर के काम को “मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी” मानने लगते हैं, तो रिश्ता सिर्फ बचता नहीं — मज़बूत भी होता है।
आखिर में
“दोनों काम करते हैं — तो घर का काम कौन करेगा?” इस सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं है, क्योंकि हर घर, हर कपल अलग है। लेकिन एक बात हर घर के लिए सच है — यह ज़िम्मेदारी किसी एक इंसान की नहीं, दो लोगों की साझा ज़िम्मेदारी है। जब दोनों पार्टनर मिलकर, बिना इल्ज़ाम के, एक-दूसरे की थकान को समझते हुए यह बँटवारा करते हैं, तभी रिश्ता सच में बराबरी वाला बनता है।
FAQs
1. दोनों पार्टनर जॉब करते हैं, फिर भी घर का ज़्यादा काम पत्नी पर क्यों आ जाता है?
यह अक्सर पुरानी सामाजिक सोच और आदतों की वजह से होता है, न कि जानबूझकर की गई नाइंसाफी। खुलकर बातचीत और काम का साफ बँटवारा इस पैटर्न को बदल सकता है।
2. अगर पार्टनर घर के काम में मदद नहीं करना चाहता तो क्या करें?
इल्ज़ाम लगाने की बजाय अपनी फीलिंग्स शेयर करें और एक साथ मिलकर सॉल्यूशन ढूंढने की कोशिश करें। ज़रूरत पड़ने पर कपल काउंसलिंग भी मददगार हो सकती है।
3. घर के काम का बँटवारा हमेशा 50-50 होना ज़रूरी है क्या?
नहीं, बराबरी का मतलब हर दिन ठीक आधा-आधा काम नहीं है — यह फेयरनेस के बारे में है, जो हर हफ्ते सिचुएशन के हिसाब से बदल सकती है।
4. वर्किंग कपल्स के लिए कोर चार्ट बनाना कितना फायदेमंद है?
काफी फायदेमंद है — यह दोनों पार्टनर्स को एक-दूसरे के काम का सही अंदाज़ा देता है और गलतफहमियाँ कम करता है।
5. क्या हाउसवर्क का बँटवारा रिश्ते की इंटिमेसी पर असर डालता है?
हाँ, जब एक पार्टनर लगातार ओवरव्हेल्म्ड महसूस करता है, तो थकान और नाराज़गी की वजह से इमोशनल और फिज़िकल क्लोजनेस दोनों कम हो सकती हैं।
6. क्या पेड हेल्प (जैसे मेड या डिशवॉशर) लेना सही फैसला है?
अगर बजट इजाज़त दे, तो यह एक समझदारी भरा फैसला है — यह दोनों पार्टनर्स के समय और रिश्ते की क्वालिटी में सीधा इन्वेस्टमेंट है।

